Saturday, April 30, 2011

Smoking..


एक धुआँ उठा

और अवशेष छोड़ गया मेरे अंदर

अंदर ही अंदर राख बनता गया यह मेरा शरीर

और यह राख कब बारूद बनी, महसूस ही नहीं  हुआ..



आज जीना चाहता हूँ

लेकिन जी ना पा रहा हूँ मैं

सिर्फ़ कुछ साँसे बाकी है

बस यही कह सकता हूँ - “जब मैं जला - तब पता चला”



2 comments:

  1. oh Vaishali...I am so proud of you. Your poetry is beautiful :) God bless you!

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